सोशल मीडिया, न्यूज़ चैनलों और बहसों के मंचों पर अक्सर एक बेहद विचित्र और उटपटांग प्रश्न उछाला जाता है—“आपके लिए पहले संविधान है या गीता?” यह प्रश्न खासकर हिंदुओं से पूछा जाता है, और कई बार अन्य समुदायों के लोगों से भी। यह सवाल ऐसा दिखाया जाता है जैसे किसी की देशभक्ति या धर्मनिष्ठा इसी सवाल से तय हो जाएगी। जो लोग पढ़े-लिखे हैं, देश की कार्यप्रणाली को समझते हैं, कानून और व्यवस्था का महत्व जानते हैं, वे बिना किसी भ्रम के संविधान को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक देश की रीढ़ उसका संविधान ही होता है। लेकिन दूसरी तरफ, वे लोग जो धार्मिक कट्टरता के चश्मे से दुनिया देखते हैं, जिन्हें तथ्यों से ज्यादा भावनाएं प्रभावित करती हैं, वे तुरंत गीता को चुन लेते हैं। वे इसे धर्म की जीत मानते हैं, जबकि असल में यह सिर्फ अज्ञानता की जीत होती है। मेरी नजर में यह पूरा प्रश्न ही मूर्खता से भरा हुआ है। यह ऐसा है जैसे कोई यह पूछे कि आपके लिए हवा जरूरी है या पानी? दोनों की अपनी-अपनी जगह है, लेकिन सवाल का मकसद ही भटकाना है। इसी तरह, संविधान और भगवतगीता का कंपैरिजन हो ही नहीं सकता, क्योंकि दोनों बिल्कुल अलग श्रेणी की चीजें हैं। ये तुलना बेबुनियाद है, खोखली है, और सिर्फ बहकाने के लिए गढ़ी गई है।

सबसे पहले तो बात यह है कि जो लोग गीता को संविधान से ऊपर चुनते हैं, उनमें से 90% लोगों ने जिंदगी में कभी गीता पढ़ी ही नहीं। उन्हें न गीता का एक श्लोक आता है, न उसका अर्थ समझ आता है, और न यह पता है कि गीता मनुष्य को क्या सिखाती है। वे लोग सिर्फ धार्मिक उन्माद और बहकावे में आकर गीता को चुनते हैं, जैसे भीड़ किसी दिशा में भाग रही हो और व्यक्ति भी बिना सोचे-समझे पीछे भाग पड़े। गीता को चुनने का मतलब यह नहीं है कि उन्होंने गीता को समझा है; इसका मतलब है कि उन्होंने गीता को एक धार्मिक प्रतीक के रूप में पकड़ रखा है, लेकिन उसके ज्ञान को कभी छुआ तक नहीं। जबकि गीता इंसान को अपने कर्तव्य का बोध कराती है। वह बताती है कि मनुष्य का धर्म क्या है, उसे अपने जीवन में कैसी दृष्टि रखनी चाहिए, किस प्रकार सही निर्णय लेना चाहिए। वह एक आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रंथ है, कानून की किताब नहीं। गीता में न कोई धारा लिखी है, न कोई सजा तय की गई है, न किसी अपराध की परिभाषा। गीता जीवन का सार बताती है, कानून नहीं बनाती।
इसके ठीक उलट, संविधान एक कानूनी दस्तावेज है—एक देश चलाने की आधारशिला। इसमें हर नागरिक के अधिकार और कर्तव्य लिखे हैं, सरकार की संरचना तय है, न्यायपालिका की शक्ति लिखी है, और यह भी तय है कि कानून का उल्लंघन करने पर क्या दंड होगा। संविधान एक पवित्र ग्रंथ की तरह नहीं है, बल्कि एक प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था का माध्यम है। यह देश को चलाता है, समाज को संतुलित रखता है और नागरिकों की सुरक्षा करता है। अब सोचिए, एक तरफ जीवन का सार समझाने वाली गीता और दूसरी तरफ देश चलाने वाली कानून की किताब —इन दोनों की तुलना कैसे की जा सकती है? यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे कोई लैपटॉप का कंपैरिजन स्मार्टवॉच से करने लगे, या हवाई जहाज़ का कंपैरिजन हेलीकॉप्टर के साथ। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में उपयोगी हैं, लेकिन एक-दूसरे का विकल्प नहीं। इसलिए संविधान और गीता के बीच तुलना करना सिर्फ अज्ञान का प्रमाण है।
लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे है। यह प्रश्न इसलिए पूछा जाता है ताकि लोगों में यह भाव पैदा किया जाए कि धर्म की किताब को संविधान से ऊपर रखना ही सही है। इस सोच के पीछे एक छिपा हुआ उद्देश्य है—हिंदुओं को यह सिखाया जाए कि गीता को सर्वोच्च मानो, ताकि हिंदू राष्ट्र की मांग को हवा दी जा सके। लेकिन यहां बड़ा धोखा यह है कि अगर कभी भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश की जाए, तो देश को चलाने वाला ग्रंथ भगवतगीता नहीं होगा। गीता से देश नहीं चल सकता क्योंकि उसमें कानून लिखे ही नहीं हैं। असल में देश को चलाने वाली किताब होगी मनुस्मृति—हिंदू समाज का पुराना कानून ग्रंथ, जिसमें जातिवाद की जड़ें गहराई से भरी हुई हैं। मनुस्मृति में ऐसे-ऐसे कानून लिखे हैं जिन्हें आधुनिक समाज में कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता। उसमें जातियों के आधार पर ऊँच-नीच, भेदभाव, सजा की असमान व्यवस्था—सब कुछ मौजूद है। अब आप सोचिए, यही कारण है कि न कोई धार्मिक गुरु और न कोई राजनीतिक नेता संविधान का कंपैरिजन मनुस्मृति से करते हैं। वे जानते हैं कि मनुस्मृति के कानून आज के समय में स्वीकार नहीं किए जा सकते। अगर वे मनुस्मृति को संविधान के मुकाबले रखें तो लोग तुरंत उसका विरोध कर देंगे। इसलिए वे गीता का सहारा लेते हैं, क्योंकि गीता एक सम्मानित धार्मिक ग्रंथ है, जिसे पढ़े बिना भी लोग उसे पूजनीय मानते हैं। गीता की आड़ लेकर मनुस्मृति को आगे बढ़ाने की कोशिश होती है, ताकि जनता भावनाओं में अंधी होकर यह समझ ही न पाए कि असल एजेंडा क्या है।
अब एक बार सोचकर देखिए—अगर तुलना करनी ही है तो तुलना संविधान और मनुस्मृति के बीच होनी चाहिए क्योंकि दोनों कानूनी ग्रंथ हैं। दोनों कानून के ढांचे की बात करते हैं। संविधान आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है जबकि मनुस्मृति प्राचीन सामाजिक ढांचे पर। संविधान समानता देता है, मनुस्मृति असमानता की नींव है। संविधान स्वतंत्रता देता है, मनुस्मृति भेदभाव करती है। इसलिए तुलना इन्हीं दोनों में हो सकती है, लेकिन तुलना गीता से क्यों? गीता का उद्देश्य ही अलग है। उसे जीवन दर्शन बताना है, कानून बनाना नहीं। इसलिए जब कोई पूछता है कि संविधान पहले या गीता पहले, तो यह समझ लेना चाहिए कि यह प्रश्न सिर्फ भ्रम पैदा करने के लिए पूछा जा रहा है, ज्ञान बढ़ाने के लिए नहीं।
अंत में बात यह है कि तुलना हमेशा एक ही कैटेगरी की चीजों के बीच होती है। आप कार का कंपैरिजन बाइक से कर सकते हैं क्योंकि दोनों वाहन हैं। आप दो मोबाइल फोन का कंपैरिजन कर सकते हैं क्योंकि दोनों एक जैसी श्रेणी में आते हैं। लेकिन आप मोबाइल फोन का कंपैरिजन कुर्सी से नहीं कर सकते। इसी तरह संविधान और गीता की तुलना बिल्कुल बेतुकी है। संविधान कानून की किताब है, जबकि गीता एक आध्यात्मिक ग्रंथ है। तुलना करनी है तो संविधान और मनुस्मृति की कीजिए—यही सही और तार्किक तुलना है। लेकिन मनुस्मृति में जातिवाद का ज़हर होने के कारण उसे लोग स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए गीता को आगे कर दिया जाता है। और यही असली चाल है—गीता की आड़ में मनुस्मृति लागू करने की तैयारी। इसलिए जब अगली बार कोई यह सवाल पूछे कि “पहले संविधान या गीता?”, तो समझ लेना कि यह सवाल ज्ञान का नहीं, बल्कि भ्रम का है; तर्क का नहीं, बल्कि प्रचार का है; और सत्य का नहीं, बल्कि मूर्खता का है।
