हमारा ब्रह्मांड अनगिनत रहस्यों से भरा हुआ है, और इन्हीं रहस्यों में सबसे गहरा रहस्य ईश्वर का है। मनुष्य हजारों वर्षों से ईश्वर को समझने की कोशिश करता रहा है, परंतु आज भी ईश्वर की वास्तविकता विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म—तीनों के लिए एक गूढ़ प्रश्न बनी हुई है। दुनिया के अधिकांश लोग ईश्वर में विश्वास करते हैं, परंतु यह विश्वास दो भागों में बंटा हुआ है—कुछ लोग ईश्वर को निराकार, बिना आकार-प्रकार वाला, शुद्ध चेतना और ऊर्जा का स्वरूप मानते हैं, जबकि अधिकांश लोग ईश्वर को साकार मानते हैं, जैसे कि कोई दिव्य शरीर वाला व्यक्ति, जिसकी आंखें हों, कान हों, हाथ-पैर हों, चेहरा हो, और कभी-कभी तो हजारों हाथों वाला भव्य रूप भी वर्णित किया गया है। किंतु ये सभी वर्णन अधिकतर कथाओं, पुराणों, चित्रों और धार्मिक साहित्य तक सिमित हैं। न आज तक किसी ने भगवान के हाथों को कार्य करते देखा, न किसी ने उसे शरीरधारी रूप में चलते, बोलते, खाते या किसी वस्तु को हाथ से बनाते देखा है। ईश्वर कैसा दिखता है? उसका रूप है या नहीं? आज संसार में कोई भी व्यक्ति इस प्रश्न का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं दे सकता।

सदियों से यह विवाद चलता आया है कि ईश्वर साकार है या निराकार। किंतु हमारे इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने आध्यात्मिक अनुभूति के माध्यम से परम सत्य को जाना—जैसे बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर आदि। इन सभी ने परमात्मा का साक्षात्कार किया, पर किसी ने भी यह नहीं कहा कि परमात्मा का कोई शरीर है, उसका कोई चेहरा है, वह किसी व्यक्ति की तरह दिखता है। बल्कि इन सभी महापुरुषों का स्पष्ट मत रहा है कि परमात्मा निराकार है—रूप, रंग और आकार से पूरी तरह परे। इनके अनुभव एक समान हैं: परम सत्ता को केवल अनुभव किया जा सकता है, देखा नहीं जा सकता; जाना जा सकता है, छुआ नहीं जा सकता; पाया जा सकता है, पर उसके लिए इंद्रियाँ पर्याप्त नहीं हैं। यह निराकार सत्ता ही सत्य है, और साकार रूप कल्पना, प्रतीक या उपासना का माध्यम भर है।
अब देखें कि शास्त्रों और संतों ने इस विषय पर क्या कहा है। यजुर्वेद 32.3 में स्पष्ट घोषणा है—“न तस्य प्रतिमा अस्ति”—ईश्वर की कोई प्रतिमा नहीं, कोई आकार नहीं। यह वाक्य अपने आप में अंतिम है—परमात्मा किसी मूर्ति, चित्र या आकार में सीमित नहीं हो सकता। यजुर्वेद 40.8 (ईशोपनिषद) कहता है—“स पर्यगात् शुक्रम् अकायम् अव्रणम्…”—अर्थात वह शरीररहित, निर्दोष, सर्वव्यापक है; उसे शरीर की आवश्यकता ही नहीं। श्वेताश्वतर उपनिषद 6.11 कहता है—एक ही देव सभी प्राणियों में छिपा है; वह सर्वव्यापक है, पर रूपहीन। बृहदारण्यक उपनिषद 3.8.8 कहता है—परमात्मा न प्राण पर निर्भर है, न मन पर; वह शुद्ध चेतना है। कठोपनिषद 2.3.9 कहता है—जिसका कोई निश्चित रूप नहीं, उसे मन से नहीं देखा जा सकता—सिर्फ अनुभूत किया जा सकता है।
भगवद्गीता में भी यही स्वर है। गीता 12.3–4 में कहा गया है कि जो अव्यक्त, अचर, निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं। गीता 13.12 बताती है कि ब्रह्म न सत है न असत; वह निराकार, अनादि और सर्वोच्च है। गीता 8.3 में ‘अक्षर ब्रह्म’ का उल्लेख है—जो रूपरहित और अविनाशी है। आदि शंकराचार्य अपने निर्वाण-षट्क में कहते हैं: “न रूपं न नामे न जातिर्न जाति…”—मैं न रूप हूं, न शरीर—मैं शुद्ध चैतन्य हूं। संत कबीर कहते हैं “निर्गुण राम जपहु रे भाई”—अर्थात परमात्मा निर्गुण और निराकार है। गुरु नानक देव कहते हैं—“इक ओंकार निरंकार”—ईश्वर एक है और निराकार है। रूमी कहते हैं कि ईश्वर न किसी रूप में बंधा है, न किसी दिशा में। पतंजलि योगसूत्र कहता है कि ईश्वर शरीर, कर्म या विकारों से परे है—वह विशेष पुरुष है, शुद्ध चेतना।
जब इतने सारे शास्त्र और महापुरुष निराकार की पुष्टि करते हैं, तब भी मनुष्य उसकी साकार कल्पना क्यों करता है? इसका कारण सरल है—मन प्रतीक चाहता है, आकृति चाहता है, कोई ठोस चीज चाहता है जिसे वह देख सके, छू सके, संबोधित कर सके। परंतु इस मनोवैज्ञानिक आवश्यकतान को समझते हुए हमें सत्य को भी स्वीकारना चाहिए: ईश्वर वास्तव में साकार नहीं है।
अब प्रश्न उठता है—यदि हम एक पल को मान लें कि ईश्वर के हाथ-पैर हैं, तो वह उनका उपयोग किस काम में करता है? मनुष्य अपने हाथ-पैर इसलिए प्रयोग करता है क्योंकि उसे काम करना होता है—खाना, चलना, उठना, बैठना, किसी वस्तु को बनाना या पकड़ना। पर ईश्वर तो सर्वव्यापी माना जाता है—वह ब्रह्मांड के कण-कण में विद्यमान है। जब कोई सत्ता हर स्थान पर पहले से ही मौजूद है, उसे किसी स्थान पर जाना नहीं पड़ता, तो उसे पैरों की जरूरत क्यों होगी? जब वह किसी वस्तु को हाथों से बनाता नहीं—क्योंकि प्रकृति की सारी रचनाएँ स्वतः चलने वाले नियमों के अनुसार ही होती हैं—तो ईश्वर के हाथ किस उद्देश्य से होंगे? ग्रह, तारे, सौर मंडल, पृथ्वी, आकाश, हवा, पानी, जीव-जंतु—इनमें से कोई भी वस्तु किसी दिव्य हाथों से प्रत्यक्ष बनती नहीं दिखती। प्रकृति स्वयं एक स्वचालित व्यवस्था की तरह काम करती है। तो फिर ईश्वर के हाथ-पैर का क्या काम?
भक्त प्रार्थना करते हैं—“हे भगवान, मेरी रक्षा करो।” पर जब कोई दुर्घटना होती है, कोई संकट आ जाता है, तो क्या भगवान अपने पैरों से चलकर आते हैं? नहीं। क्या वे अपने हाथों से व्यक्ति को संकट से खींचकर बाहर निकाल देते हैं? ऐसा भी नहीं। यह सब मात्र धार्मिक कथाओं में होता है। वास्तविकता में मनुष्य को अपना बचाव स्वयं करना पड़ता है, अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ढूँढना पड़ता है। यदि ईश्वर सुनता है, तो फिर इतनी प्रार्थनाएँ अनसुनी क्यों रह जाती हैं? यदि वह देखता है, तो इतने दुख, अन्याय और पीड़ा क्यों बनी रहती है? यदि उसके कान हैं, तो वह पुकारों पर ध्यान क्यों नहीं देता? यदि उसकी आंखें हैं, तो वह संसार में व्याप्त पीड़ा को कैसे अनदेखा कर देता है?
अधिकांश भक्तों का जीवन संघर्ष, गरीबी, बीमारी, कर्ज और मानसिक दुखों से भरा हुआ क्यों दिखाई देता है? क्योंकि मनुष्य ईश्वर से अपेक्षा करता है कि वह उसकी समस्याओं को हल कर देगा। लेकिन जब समस्याएँ हल नहीं होतीं, तो कहा जाता है—“यह तो तुम्हारे कर्मों का फल है।” यानी जब ईश्वर मदद न करे, तो पूरा बोझ मनुष्य के सिर पर डाल दिया जाता है।
सच्चाई यह है कि जब तक हम ईश्वर को एक व्यक्ति समझते रहेंगे—एक शरीरधारी सत्ता, जिसके हाथ-पैर हों—तब तक हम भ्रम में ही रहेंगे। साकार रूप केवल प्रतीक है, सत्य नहीं। साकार ईश्वर की आवश्यकता अधिकतर उन लोगों को है जिनकी आजीविका उसी पर आधारित है—मंदिर, आयोजन, अनुष्ठान, दान-पेटियाँ, भोग, वस्त्र, आभूषण… क्योंकि यदि ईश्वर निराकार समझ लिया जाए, तो यह व्यापार समाप्त हो जाए। साकार रूप इसलिए बनाया गया है ताकि मनुष्य को एक मूर्त प्रतीक दिया जा सके, और साथ ही धार्मिक व्यवस्था भी चलती रहे।
लेकिन सत्य यह है कि साकार ईश्वर कहीं बाहर नहीं है—मनुष्य का शरीर ही ईश्वर का साकार रूप है। क्योंकि सभी महापुरुषों ने कहा है—“ईश्वर भीतर है।” जब मनुष्य ध्यान के माध्यम से अपनी चेतना को भीतर ले जाता है और उस विराट चेतना का अनुभव करता है, तब वह जान लेता है—“अहम् ब्रह्मास्मि”—मैं ही ब्रह्म हूँ। जब मैं ही ब्रह्म हूँ, तो यह शरीर ही अस्थायी साकार रूप है, जो मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है, किंतु भीतर की निराकार चेतना कभी नहीं मिटती—वही शाश्वत, अनंत, अजर-अमर है। वही वास्तविक ईश्वर है।
जो इस सत्य को समझ लेता है, वह जीवनभर चिंता-मुक्त, निर्भय और आनंद में रहता है। उसे भ्रमित नहीं किया जा सकता, न अंधविश्वासों के जाल में फँसाया जा सकता है। वह जान लेता है कि सच्चा ईश्वर कोई शरीरधारी देवता नहीं, बल्कि वही चेतना है जो उसके भीतर धड़क रही है। इसी सत्य को जानने वाला मनुष्य वास्तव में आध्यात्मिक होता है—प्रबुद्ध, स्वतंत्र और जाग्रत।


