भारत जैसे देश में सदियों से एक परंपरा चली आ रही है कि परिवार का “वंश” तब तक अधूरा माना जाता है जब तक एक बेटा पैदा न हो जाए। चाहे घर में पाँच बेटियाँ हों, चाहे माँ-बाप की उम्र निकल चुकी हो, समाज तब तक चैन से नहीं बैठता जब तक एक लड़का पैदा न हो जाए। बेटे को परिवार की सफलता, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की गारंटी समझा जाता है। यही सोच लोगों को मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, दरगाह और बाबाओं के दरवाज़े तक ले जाती है। लोग मन्नतें माँगते हैं, व्रत रखते हैं, चढ़ावे चढ़ाते हैं — लेकिन यह सब एक इंसान पाने के लिए नहीं, बल्कि एक “लिंग” पाने के लिए किया जाता है: बेटा।

विडंबना यह है कि इतनी ऊर्जा, इतनी आस्था और इतना डर कभी बेटी के लिए नहीं लगाया जाता। बेटी अगर हो जाए तो उसे ईश्वर का प्रसाद नहीं माना जाता, बल्कि एक “समझौता” समझ लिया जाता है। लोग कहते हैं, “कोई बात नहीं, अगली बार बेटा हो जाएगा।” यानी बेटी को भी एक असफल प्रयास की तरह देखा जाता है। समाज में बेटा होना सफलता है और बेटी होना इंतज़ार। यह भेदभाव इतना गहरा है कि लोग अपने गर्भ में पल रहे जीवन के लिए भी शर्तें लगाने लगते हैं — अगर बेटा हो तो स्वागत, अगर बेटी हो तो चुप्पी।
असल में यह पूरी सोच “वंश” से ज़्यादा “अहंकार” से जुड़ी हुई है। लोग कहते हैं कि उन्हें वंश आगे बढ़ाना है, लेकिन वे कभी यह नहीं पूछते कि उनका वंश किस बात का है। क्या उनका वंश करुणा का है, सच्चाई का है, प्रेम का है या केवल नाम और संपत्ति का? अधिकतर मामलों में वंश का अर्थ होता है — मेरा नाम, मेरा खून, मेरी पहचान। बेटा उस पहचान का प्रतीक बन जाता है। बेटा पैदा होते ही आदमी के भीतर यह भावना पैदा हो जाती है कि अब वह समाज में पूरा हो गया है, अब उसका नाम मिटेगा नहीं। यह भावना आध्यात्मिक नहीं, बल्कि शुद्ध अहंकार की होती है।
समाज में बेटे को केवल बच्चा नहीं माना जाता, बल्कि भविष्य की मूर्ति बना दिया जाता है। कहा जाता है कि वही अंतिम संस्कार करेगा, वही परिवार को आगे बढ़ाएगा, वही बुढ़ापे का सहारा बनेगा। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। आज अनगिनत माँ-बाप ऐसे हैं जिनके बेटे उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ चुके हैं, या भावनात्मक रूप से उन्हें पूरी तरह त्याग चुके हैं। फिर भी समाज यह मानने को तैयार नहीं होता कि बेटा होना किसी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। फिर भी बेटा चाहिए, क्योंकि वह सुरक्षा नहीं, बल्कि “इमेज” देता है।
बेटा सामाजिक स्वीकृति का टिकट बन चुका है। जिस घर में बेटा पैदा होता है, वहाँ बधाइयाँ ज़्यादा आती हैं, मिठाइयाँ ज़्यादा बँटती हैं और लोग ज़्यादा सम्मान से बात करते हैं। बेटी के जन्म पर अक्सर चुप्पी या औपचारिकता होती है। यह अंतर इस बात का प्रमाण है कि समस्या बच्चों में नहीं, हमारी मानसिकता में है। हमने बेटा और बेटी को इंसान की तरह नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतीक की तरह देखना शुरू कर दिया है।
लोग यह सोचते हैं कि अगर उनका बेटा नहीं होगा तो उनका वंश खत्म हो जाएगा, मानो पूरी पृथ्वी उनके परिवार पर टिकी हुई हो। यह एक हास्यास्पद भ्रम है। इतिहास में लाखों वंश आए और चले गए। किसी के वंश के खत्म होने से न तो सूर्य रुका, न धरती घूमना बंद हुई। लेकिन फिर भी लोग इस भ्रम में जीते हैं कि उनका नाम अमर हो जाएगा अगर बेटा होगा। यही भ्रम उन्हें अंधी आस्था और कर्मकांड में धकेल देता है।
बेटा पाने की लालसा इतनी गहरी है कि कई परिवार अपनी बेटियों को बोझ समझने लगते हैं। वे उन्हें प्यार देने की बजाय यह सोचते हैं कि “अगर यह लड़का होता तो बेहतर होता।” यह भाव बच्चों के मन में जीवन भर का घाव छोड़ देता है। एक बेटी अपने ही घर में यह महसूस करती है कि वह किसी और की जगह ले रही है। यह मानसिक हिंसा किसी शारीरिक हिंसा से कम नहीं होती।
धार्मिक स्थलों पर जाकर बेटा माँगना भी एक तरह की सौदेबाज़ी है। लोग भगवान से कहते हैं, “तू मुझे बेटा दे, मैं तुझे यह दूँगा।” जैसे ईश्वर कोई मशीन हो जो इच्छानुसार संतान पैदा कर दे। कोई यह नहीं कहता कि “भगवान, मुझे ऐसा बच्चा दे जो अच्छा इंसान बने।” इससे साफ़ पता चलता है कि लोगों की समस्या संतान नहीं, समाज में अपनी स्थिति है।
जब बेटा पैदा होता है तो घर में एक तरह का अहंकार भर जाता है। पिता सोचता है कि अब उसका नाम चलेगा, माँ सोचती है कि अब उसका अस्तित्व सुरक्षित है, परिवार सोचता है कि अब उसकी लाइन बच गई। यह सारी सोच “मैं” से जुड़ी होती है — मेरा नाम, मेरा खून, मेरी पहचान। इसमें बच्चे का अपना अस्तित्व कहीं खो जाता है। बच्चा अपने माता-पिता का विस्तार बन जाता है, एक स्वतंत्र व्यक्ति नहीं।
आश्चर्य की बात यह है कि वही लोग जो बेटे के लिए इतना कुछ करते हैं, बाद में उसी बेटे से प्यार और संवेदना की अपेक्षा भी नहीं करते। वे उससे आज्ञाकारिता चाहते हैं, कर्तव्य चाहते हैं, सेवा चाहते हैं। अगर बेटा अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीना चाहे तो उसे स्वार्थी कहा जाता है। यानी बेटा भी अंततः एक उपकरण बन जाता है — वंश चलाने का, नाम बचाने का, समाज में सिर ऊँचा रखने का।
सच यह है कि जो व्यक्ति भीतर से जागरूक है, उसे बेटा या बेटी से फर्क नहीं पड़ता। वह जानता है कि जीवन किसी नाम से नहीं, चेतना से चलता है। उसे यह भी पता होता है कि कोई भी इंसान किसी का स्थायी नहीं होता। बच्चे भी बड़े होकर अपनी राह चुनते हैं। उन्हें अपने माता-पिता के अधूरे सपनों को ढोने के लिए पैदा नहीं किया गया है।
जो लोग बेटा चाहते हैं, वे असल में मृत्यु से डरते हैं। वे चाहते हैं कि उनके जाने के बाद भी कुछ ऐसा रहे जो उन्हें जोड़कर रखे। लेकिन नाम, वंश और खून से कोई भी अमर नहीं होता। अमर वही होता है जिसने जीवन को समझ लिया हो। जिसने प्रेम को पहचाना हो। जिसने अहंकार को गिरा दिया हो।
अगर समाज सच में आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे बेटे-बेटी की इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा। संतान को इंसान की तरह देखना होगा, न कि भविष्य के बीमे की तरह। जब तक हम यह नहीं समझेंगे, तब तक हम चाहे जितने मंदिरों में जाएँ, हमारी सोच पिछड़ी ही रहेगी।
अंत में सच यह है कि बेटा चाहने की जड़ में वंश नहीं, डर और अहंकार है। और जब तक यह अहंकार टूटेगा नहीं, तब तक इंसान इंसान को बराबरी से नहीं देख पाएगा — चाहे वह उसका अपना ही बच्चा क्यों न हो।


