आज हमारे देश में हर तरफ एक ही शोर सुनाई देता है कि अपने इतिहास का बदला लो, अपने धर्म की रक्षा करो और देश के लिए मर मिटो। टीवी चैनलों से लेकर नेताओं के भाषणों तक युवाओं के भीतर गुस्सा, अपमान और बदले की भावना भरी जाती है। उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि उनका सबसे बड़ा कर्तव्य किसी न किसी से लड़ना है। लेकिन इस पूरे शोर में एक बुनियादी सवाल कहीं खो जाता है कि जो नेता युवाओं से बलिदान मांग रहे हैं, क्या वे अपने ही बच्चों से भी वही मांगते हैं या यह बलिदान सिर्फ गरीब और आम आदमी के बच्चों के लिए आरक्षित है।

अगर हम ईमानदारी से देखें तो लगभग हर बड़े राजनीतिक नेता के बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं। वे अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या यूरोप की टॉप यूनिवर्सिटियों में सुरक्षित माहौल, आधुनिक शिक्षा और बेहतरीन सुविधाओं के बीच अपना भविष्य बना रहे हैं। वहीं वही नेता भारत के युवाओं से सड़कों पर उतरने, आंदोलनों में कूदने और धर्म तथा इतिहास के नाम पर लड़ने की अपील करते हैं। यह दोहरा मापदंड इस बात का सबूत है कि नेता खुद जानते हैं कि नारे लगाने से भविष्य नहीं बनता और भीड़ में शामिल होने से करियर नहीं बनता।
नेता अपने बच्चों को इसलिए विदेश भेजते हैं क्योंकि वे सच्चाई जानते हैं। वे जानते हैं कि असली ताकत शिक्षा, नेटवर्क और अवसरों में होती है, न कि पत्थर फेंकने या नफरत फैलाने में। वे जानते हैं कि जो युवा अपना समय किताबों, रिसर्च और स्किल्स में लगाता है वही कल सिस्टम को चलाता है, और जो युवा भावनाओं में बहकर सड़कों पर उतरता है वही सिस्टम का शिकार बनता है। इसलिए अपने बच्चों के लिए वे दुनिया खोल देते हैं और जनता के बच्चों के लिए सिर्फ भावनात्मक जेल।
इतिहास का बदला लेना राजनीति का सबसे खतरनाक हथियार है। जब नेताओं के पास वर्तमान की समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता तो वे अतीत की कब्रें खोदने लगते हैं। युवाओं को बताया जाता है कि उनके पूर्वजों के साथ सैकड़ों साल पहले अन्याय हुआ था और अब उसका बदला लेना उनका कर्तव्य है। इस भावनात्मक नशे में बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और समाज एक अदृश्य दुश्मन से लड़ने लगता है।
इस खेल में नेताओं को बहुत फायदा होता है। भावनाओं से भरी भीड़ को कंट्रोल करना बहुत आसान होता है क्योंकि वह तर्क नहीं करती, वह सिर्फ प्रतिक्रिया देती है। जितनी ज़्यादा भीड़ उग्र होगी, उतना ही नेता शक्तिशाली बनेगा। धर्म, जाति और इतिहास राजनीति के लिए सबसे सस्ते और सबसे असरदार हथियार हैं क्योंकि इनके लिए किसी सबूत या योजना की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ डर और गुस्से की ज़रूरत होती है।
यह परंपरा कोई नई नहीं है। राजाओं के ज़माने से ही शासक अपने बेटों को महलों में सुरक्षित रखते थे और किसानों के बेटों को युद्ध के मैदान में भेजते थे। आज राजा नहीं हैं लेकिन सिस्टम वही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब युद्ध सीमा पर नहीं बल्कि समाज के भीतर लड़े जाते हैं। कभी धर्म के नाम पर, कभी विचारधारा के नाम पर और कभी राष्ट्रवाद के नाम पर।
इन हर लड़ाइयों में सबसे ज़्यादा नुकसान हमेशा गरीब और मध्यम वर्ग के युवाओं का होता है। उनकी पढ़ाई छूट जाती है, उनके करियर रुक जाते हैं और उनका जीवन हिंसा और नफरत के इर्द-गिर्द घूमने लगता है। जबकि नेताओं के बच्चे सुरक्षित देशों में पढ़ते हैं, बिज़नेस करते हैं और भविष्य की प्लानिंग करते हैं। सत्ता की इस असमानता को समझना ही असली जागरूकता है।
अगर कोई नेता वास्तव में राष्ट्र से प्रेम करता होता तो वह सबसे पहले यह सुनिश्चित करता कि देश के हर बच्चे को अच्छी शिक्षा, अच्छे कॉलेज और सुरक्षित माहौल मिले। लेकिन जब नेता खुद अपने बच्चों को देश से बाहर भेजते हैं तो यह साफ हो जाता है कि वे भारत को संघर्ष की जगह और विदेशों को अवसर की जगह मानते हैं। यही उनकी असली सोच है।
युवा किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होते हैं, लेकिन भारत में उन्हें सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बना दिया गया है। जब युवा नफरत में डूबा होता है तो वह सवाल पूछना बंद कर देता है। और जब समाज सवाल पूछना बंद कर देता है, तभी सत्ता निरंकुश बन जाती है और नेता मनमानी करने लगते हैं।
इसलिए हर उस युवा को जो किसी नेता की बातों में बह रहा है, एक सवाल जरूर पूछना चाहिए कि आपका बेटा कहाँ पढ़ रहा है और मेरी लड़ाई किसके लिए है। जब तक यह सवाल नहीं पूछा जाएगा, तब तक नेता अपने बच्चों के लिए भविष्य बनाते रहेंगे और जनता के बच्चों को सिर्फ बलिदान मिलता रहेगा।
यही राजनीति का सबसे बड़ा और सबसे कड़वा सच है कि लड़ने वाले हमेशा गरीबों के बच्चे होते हैं और फायदा हमेशा अमीरों के घरों को मिलता है। जो इस सच को समझ लेता है, वही असली आज़ाद सोच वाला नागरिक बनता है।


