मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या किसी भी धार्मिक स्थल को लेकर जब हिंसा, विवाद और घृणा देखने को मिलती है, तो एक मूल प्रश्न स्वतः खड़ा हो जाता है कि क्या वास्तव में वहाँ ईश्वर या अल्लाह का वास है। यदि सच में ईश्वर इन इमारतों में रहता, तो क्या वहाँ से नफ़रत, डर और रक्तपात जन्म लेता? वास्तविकता यह है कि इन स्थलों में कोई ईश्वर नहीं रहता, बल्कि वहाँ मनुष्य की सामूहिक भावनाएँ, उसकी मान्यताएँ और उसका अहं निवास करता है। ईंट और पत्थर केवल प्रतीक हैं, पर संघर्ष उन भावनाओं का होता है जिन्हें मनुष्य सत्य समझ बैठता है।

मनुष्य जिस पूजा या इबादत को ईश्वर की आराधना समझता है, वह प्रायः उसकी अपनी भावनाओं की पूजा होती है। उसका डर, उसकी आशा, उसकी असुरक्षा और उसकी पहचान एक काल्पनिक ईश्वर का रूप ले लेती है। जब तक कोई उस विश्वास को चुनौती नहीं देता, तब तक वह शांत रहता है, लेकिन जैसे ही उसकी मान्यता पर प्रश्न उठता है, वह क्रोधित हो जाता है। इस क्रोध का कारण ईश्वर नहीं, बल्कि आहत भावनाएँ होती हैं। इसीलिए इंसान ईश्वर की रक्षा नहीं करता, वह अपनी भावनाओं की रक्षा करता है।
धर्म का मूल उद्देश्य आत्मचिंतन और सत्य की खोज था, लेकिन समय के साथ धर्म मनुष्य की पहचान, समूह और सत्ता से जुड़ गया। जब धर्म आंतरिक साधना से हटकर बाहरी पहचान बन जाता है, तब वह सत्य का मार्ग न रहकर भावनाओं का कवच बन जाता है। लोग यह कहने लगते हैं कि धर्म खतरे में है, जबकि वास्तव में खतरे में उनकी मान्यताएँ और उनका अहं होता है। धर्म का नाम लेकर वे अपने डर और असुरक्षा को पवित्र बना देते हैं।
इतिहास यह स्पष्ट करता है कि कोई भी हत्या ईश्वर के लिए नहीं होती। न कोई अल्लाह निर्दोषों का खून माँगता है, न कोई ईश्वर हिंसा का आदेश देता है। हत्या इसलिए होती है क्योंकि किसी व्यक्ति या समूह की भावनाएँ आहत होती हैं, उसकी पहचान खतरे में पड़ती है और उसका विश्वास डगमगाने लगता है। उस हिंसा को सही ठहराने के लिए उसे धर्म का नाम दे दिया जाता है, ताकि अपराध भी पुण्य प्रतीत हो।
सदियों पहले महापुरुषों ने इस खतरे को पहचान लिया था। कबीर ने पत्थर पूजने की मानसिकता पर सीधा प्रहार किया और बताया कि ईश्वर को बाहरी वस्तुओं में खोजने वाला व्यक्ति अपने ही भ्रम की पूजा कर रहा है। गौतम बुद्ध ने ईश्वर की दार्शनिक बहसों में उलझने के बजाय मनुष्य के दुःख और चेतना को समझने पर ज़ोर दिया। आदि शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि ब्रह्म किसी मूर्ति या मंदिर में सीमित नहीं है, वह ज्ञान है, जिसे जाना जाता है, पूजा नहीं जाता। फिर भी मनुष्य ने ज्ञान के मार्ग को छोड़कर भावना के मार्ग को चुन लिया।
समस्या धर्म में नहीं है, समस्या तब शुरू होती है जब मनुष्य अपनी भावनाओं को धर्म मान लेता है। जो उसे अच्छा लगता है वही सत्य बन जाता है, जो उसे चुनौती देता है वही अधर्म कहलाने लगता है। यहीं संवाद समाप्त हो जाता है और संघर्ष आरंभ होता है। धर्म यदि चेतना को विस्तार दे तो मुक्त करता है, लेकिन यदि वह केवल भावना को पोषित करे तो विनाश का कारण बन जाता है।
यह सत्य स्वीकार करना कठिन है कि मनुष्य ईश्वर की नहीं, अपनी भावनाओं की पूजा करता है, लेकिन यही स्वीकार मनुष्य को हिंसा और अंधभक्ति से मुक्त कर सकता है। जिस दिन मनुष्य यह समझ लेगा कि ईश्वर किसी इमारत में नहीं, बल्कि चेतना और विवेक में है, उसी दिन मंदिर और मस्जिद अपने आप विवाद का कारण नहीं रहेंगे। ईश्वर को खोजने के लिए इमारतें नहीं, बल्कि अहं को गिराना पड़ता है।


