मनुष्य के जीवन में आस्था एक अत्यंत शक्तिशाली शक्ति है। यह वह भाव है जो मनुष्य को टूटने से बचाता है, उसे सहारा देता है और कठिन समय में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। लेकिन यही आस्था जब भ्रम के साथ जुड़ जाती है, तब वह मुक्ति का साधन नहीं बल्कि बंधन बन जाती है। समस्या तब पैदा होती है जब मनुष्य यह भूल जाता है कि वह परमात्मा में आस्था रख रहा है या परमात्मा के नाम पर बनी किसी वस्तु में।

परमात्मा में आस्था का अर्थ है उस चेतना में विश्वास करना जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। वह चेतना किसी एक रूप, किसी एक नाम या किसी एक स्थान तक सीमित नहीं होती। वह मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, नदी और आकाश — सबमें समान रूप से प्रवाहित होती है। जब कोई व्यक्ति परमात्मा में आस्था रखता है, तो वह जीवन को एकता के रूप में देखने लगता है। उसके भीतर करुणा, प्रेम और शांति जन्म लेती है क्योंकि वह हर जीव में उसी एक शक्ति को देखता है।
इसके विपरीत, जब आस्था परमात्मा के नाम पर बनी वस्तुओं में टिक जाती है, तब समस्या शुरू होती है। मूर्तियाँ, प्रतीक, ग्रंथ, धार्मिक स्थल — ये सब मनुष्य द्वारा बनाए गए हैं। ये प्रकृति के ही रूप हैं, लेकिन जब इन्हें स्वयं परमात्मा मान लिया जाता है, तब आस्था एक जीवंत चेतना से हटकर निर्जीव वस्तु में फंस जाती है। यहीं से भक्ति का स्थान आसक्ति ले लेती है।
जब मनुष्य का प्रेम परमात्मा से हटकर किसी वस्तु में टिक जाता है, तो वह प्रेम शुद्ध नहीं रह जाता। वह “मेरा” और “तेरा” में बँट जाता है। अब वह वस्तु उसकी पहचान बन जाती है — उसका धर्म, उसका भगवान, उसका सत्य। यही पहचान धीरे-धीरे अहंकार में बदल जाती है और वहीं से टकराव, कट्टरता और हिंसा जन्म लेते हैं।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जितनी भी धार्मिक हिंसा हुई है, वह परमात्मा के लिए नहीं, बल्कि परमात्मा के नाम पर बनी वस्तुओं के लिए हुई है। किसी मूर्ति के लिए, किसी पुस्तक के लिए, किसी इमारत के लिए, किसी प्रतीक के लिए मनुष्य एक-दूसरे का खून बहाने तक को तैयार हो गया। यह कितना बड़ा विडंबना है कि जिसे प्रेम का स्रोत माना जाता है, उसी के नाम पर घृणा फैलाई जाती है।
जब कोई वस्तु परमात्मा बन जाती है, तब वह वस्तु पहचान बन जाती है। और पहचान हमेशा विभाजन लाती है। “यह मेरा भगवान है”, “यह मेरा धर्म है”, “यह मेरी पूजा पद्धति है” — ऐसे विचार मनुष्य को दूसरे मनुष्य से अलग कर देते हैं। तब सामने वाला व्यक्ति इंसान नहीं रहता, वह “दूसरे धर्म वाला” बन जाता है, और यहीं से मनुष्य-मनुष्य के बीच की दूरी शुरू हो जाती है।
मनुष्य यह भूल जाता है कि वह स्वयं भी प्रकृति का ही एक हिस्सा है। जिस मिट्टी से मूर्ति बनी है, उसी मिट्टी से उसका शरीर भी बना है। जिस ऊर्जा से वह प्रतीक बना है, उसी ऊर्जा से उसका जीवन भी चलता है। फिर भी वह उस वस्तु को इतना बड़ा बना लेता है कि उसके लिए दूसरों को दुख देना भी सही लगने लगता है।
सच्ची आस्था कभी हिंसक नहीं होती। सच्ची आस्था जोड़ती है, तोड़ती नहीं। वह मनुष्य को विनम्र बनाती है, अहंकारी नहीं। वह दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार करना सिखाती है, उन्हें मिटाना नहीं। अगर आपकी आस्था आपको दूसरों से श्रेष्ठ महसूस कराती है, अगर वह आपको क्रोधित और कठोर बनाती है, तो समझ लेना चाहिए कि वह आस्था परमात्मा से नहीं, बल्कि किसी वस्तु से जुड़ी हुई है।
परमात्मा को किसी मूर्ति में कैद नहीं किया जा सकता और न ही किसी किताब में बाँधा जा सकता है। परमात्मा तो चेतना है — वह देखने वाले में है, सुनने वाले में है, सोचने वाले में है और प्रेम करने वाले में है। जब मनुष्य यह समझ जाता है, तब उसकी पूजा बदल जाती है। वह फूल चढ़ाने से अधिक प्रेम बाँटने लगता है और दीप जलाने से अधिक अज्ञान को मिटाने लगता है।
आज दुनिया को धर्म की नहीं, चेतना की आवश्यकता है। परमात्मा को ढूंढने की नहीं, परमात्मा को जीने की आवश्यकता है। जब मनुष्य हर जीव में वही एक चेतना देखने लगेगा, तब मंदिर, मस्जिद और चर्च के बीच की दीवारें अपने आप गिरने लगेंगी। उस दिन आस्था वस्तुओं में नहीं, जीवन में होगी — और वही सच्ची भक्ति होगी।


