हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ चारों तरफ़ देशभक्ति का शोर है, झंडों की भरमार है, सोशल मीडिया पर राष्ट्रवाद की लहरें हैं और टीवी पर इतिहास की लड़ाइयाँ रोज़ लड़ी जा रही हैं। लेकिन इसी शोर के बीच आम आदमी की ज़िंदगी लगातार कठिन होती जा रही है। बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत समस्याएँ धीरे-धीरे चर्चा से बाहर होती जा रही हैं। यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक गहरी राजनीतिक रणनीति का परिणाम है।

इतिहास मूल रूप से सीखने के लिए होता है, ताकि हम जान सकें कि समाज कैसे बना, सत्ता कैसे बदली और जनता कैसे शोषित हुई। लेकिन सत्ता जब इतिहास को हथियार बना लेती है, तब वह ज्ञान नहीं, नियंत्रण का साधन बन जाता है। जनता को अतीत की भावनाओं में उलझा कर वर्तमान की सच्चाइयों से दूर रखा जाता है।
जब आज नौकरी नहीं होती, तो कल के गौरव की बातें की जाती हैं। जब किसान कर्ज़ में डूबा होता है, तो सदियों पुराने अपमान की याद दिलाई जाती है। जब युवाओं के सामने भविष्य अंधकारमय होता है, तब उन्हें अतीत की लड़ाइयों में झोंक दिया जाता है। अतीत की चोटों को बार-बार कुरेद कर लोगों के भीतर भावनात्मक उबाल पैदा किया जाता है ताकि वे तर्क से नहीं, ग़ुस्से और गर्व से सोचें।
यही वह चीज़ है जिसे “इतिहास का इंजेक्शन” कहा जा सकता है। यह स्वाभाविक स्मृति नहीं होती, बल्कि रोज़-रोज़ दी जाने वाली डोज़ होती है। टीवी डिबेट, सोशल मीडिया ट्रेंड, बदली हुई पाठ्यपुस्तकें, राजनीतिक भाषण और फ़िल्में — सब एक ही बात दोहराते हैं कि हमारे साथ अतीत में बहुत अन्याय हुआ था। धीरे-धीरे यह अन्याय आज की समस्याओं से बड़ा लगने लगता है।
असली देशभक्ति वर्तमान की चिंता करती है। वह पूछती है कि देश के कितने युवा बेरोज़गार हैं, कितने बच्चे कुपोषित हैं, कितने लोग इलाज के बिना मर रहे हैं और न्याय व्यवस्था कितनी ईमानदार है। नकली देशभक्ति इन सवालों से भागती है और 500 या 1000 साल पुरानी घटनाओं में उलझ जाती है।
असली देशभक्त समाधान ढूँढता है, नकली देशभक्त दुश्मन ढूँढता है। असली देशभक्ति देश को बेहतर बनाने की कोशिश करती है, नकली देशभक्ति समाज को तोड़ कर सत्ता को मजबूत बनाती है। जब लोगों को आपस में धर्म, जाति और इतिहास के नाम पर बाँट दिया जाता है, तब वे एकजुट होकर वर्तमान के शोषण पर सवाल नहीं उठा पाते।
राजनीति में भावनाएँ सबसे सस्ती और सबसे प्रभावी मुद्रा होती हैं। डर, ग़ुस्सा, गर्व और बदला — इन सबका इस्तेमाल वोट पाने के लिए किया जाता है। जब लोग डरते हैं, तो वे सवाल नहीं करते। जब वे ग़ुस्से में होते हैं, तो तर्क खो देते हैं। जब वे गर्व में होते हैं, तो अपनी पीड़ा भूल जाते हैं।
इसीलिए इतिहास को धर्म से जोड़ दिया जाता है। क्योंकि धर्म सवाल नहीं करता, वह मानता है। और जब इतिहास धर्म बन जाता है, तब सत्ता को चुनौती देना ईश्वर को चुनौती देने जैसा दिखने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र मरने लगता है।
जनता इस जाल में इसलिए भी फँस जाती है क्योंकि वर्तमान बहुत दर्दनाक है। बेरोज़गारी आत्मसम्मान तोड़ती है, महँगाई जीवन को भारी बना देती है और असुरक्षा डर पैदा करती है। ऐसे में अतीत का गौरव एक नशे की तरह राहत देता है — “आज हम भले परेशान हैं, लेकिन कभी हम महान थे।” यह सोच कुछ देर के लिए दर्द को ढक देती है।
सोशल मीडिया इस पूरे खेल का नया मैदान बन गया है। हर दिन नया वीडियो, नया दुश्मन, नई कहानी, नया अपमान। लोग शेयर करते हैं, लड़ते हैं, गालियाँ देते हैं, लेकिन अपने जीवन की सच्ची समस्याओं पर कोई बात नहीं होती। डिजिटल भीड़ को अतीत में उलझाकर वर्तमान से काट दिया गया है।
इतिहास को भूलना भी खतरनाक है और उसका नशा करना भी। सही रास्ता यह है कि हम इतिहास को समझें, उससे सीखें, लेकिन उसे वर्तमान की लूट छुपाने का औज़ार न बनने दें। जिस दिन जनता यह पूछने लगेगी कि अगर हमारे पूर्वजों के साथ अन्याय हुआ था तो आज हमारे साथ क्यों हो रहा है, उसी दिन नकली देशभक्ति ढहने लगेगी।
सत्ता जानती है कि अगर जनता वर्तमान को समझ लेगी, तो वह सवाल उठाएगी। इसलिए उसे इतिहास के इंजेक्शन देकर देशभक्ति और धर्म के नशे में रखा जाता है। लेकिन सच्ची आज़ादी अतीत की नहीं, वर्तमान की समझ से आती है। जिस दिन लोग अपने आज को पहचान लेंगे, उसी दिन कोई भी उन्हें बीते कल के नाम पर गुलाम नहीं बना पाएगा।


