इंसान इस दुनिया में भावनाओं के साथ पैदा होता है। डर, प्रेम, क्रोध, वासना, दुख और ईर्ष्या किसी स्कूल में सिखाए नहीं जाते, ये भीतर से ही जन्म लेते हैं। एक छोटा बच्चा जब रोता है या ज़िद करता है, तो वह कोई अपराध नहीं कर रहा होता, वह अपनी आंतरिक ऊर्जा को व्यक्त कर रहा होता है। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज उसे सिखाता है कि कुछ भावनाएँ ठीक हैं और कुछ गलत। उसे यह नहीं सिखाया जाता कि भावनाओं को कैसे समझा जाए, बल्कि यह सिखाया जाता है कि उन्हें कैसे दबाया जाए। यहीं से इंसान अपने ही भीतर से कटने लगता है।

समाज को ऐसे इंसान चाहिए जो नियंत्रित हो, जो सवाल न पूछे और जो व्यवस्था के अनुसार चले। भावनाएँ इंसान को जीवित, स्वतंत्र और असहज बना देती हैं, इसलिए उन्हें खतरनाक माना गया। प्रेम इंसान को सीमाओं से बाहर ले जाता है, क्रोध उसे अन्याय के खिलाफ खड़ा कर देता है, दुख उसे गहराई देता है और वासना जीवन की तीव्रता का एहसास कराती है। ये सारी भावनाएँ इंसान को पूरी तरह जीवित बनाती हैं, लेकिन समाज को ऐसे जीवित लोग नहीं चाहिए, उसे ऐसे लोग चाहिए जो भीतर से टूटे हों और बाहर से आज्ञाकारी हों।
जब इंसान भावनाओं को समझ नहीं सका तो उसने कानून बना दिए। क्रोध को अपराध कहा गया, वासना को पाप, दुख को कमजोरी और प्रेम को नियंत्रित करने की चीज़। कानून भावनाओं को ठीक नहीं करते, वे केवल उन्हें दबाते हैं। जैसे उबलते पानी पर ढक्कन रख दिया जाए, बाहर से सब शांत दिखेगा लेकिन भीतर दबाव बढ़ता जाएगा। यही दबा हुआ दबाव आगे चलकर हिंसा, यौन अपराध, नफरत और कट्टरता बनकर फूटता है।
यही खेल प्रेम के साथ भी हुआ। जब दो लोग आपस में सच में प्रेम करते हैं, तो उनकी आँखों में एक चमक होती है, एक स्वतंत्रता होती है, एक पूर्णता होती है। यह दृश्य समाज को असहज कर देता है क्योंकि ज़्यादातर लोग खुद अपने जीवन में प्रेम को नहीं जी पाए होते। जो खुद अधूरा है, वह दूसरों की पूर्णता देखकर जलने लगता है। समाज को यह सहन नहीं होता कि दो लोग बिना उसकी अनुमति के खुश हो जाएँ, इसलिए प्रेम पर पहरे बिठा दिए गए।
इस ईर्ष्या से ही नियम बने कि तुम अपनी मर्ज़ी से शादी नहीं कर सकते। माँ-बाप तय करेंगे, जाति तय करेगी, धर्म तय करेगा, बिरादरी तय करेगी, हैसियत तय करेगी। प्रेम को नहीं, बल्कि समाज के अहंकार को बचाने के लिए ये दीवारें खड़ी की गईं। अगर प्रेम को खुला छोड़ दिया जाए तो इंसान जाति, धर्म और झूठी इज़्ज़त से ऊपर उठ जाएगा, और तब समाज की बनाई सारी जेलें गिर जाएँगी।
धर्म ने भी यही किया। उसने इंसान को अपनी भावनाओं से डरना सिखाया। डर को ईश्वर का डर बना दिया गया, प्रेम को भक्ति में बदल दिया गया और क्रोध को पाप घोषित कर दिया गया। इंसान को बताया गया कि जो तुम्हारे भीतर उठ रहा है वह गलत है। धीरे-धीरे इंसान अपने ही मन से डरने लगा। जब कोई अपने भीतर की आग, अपनी वासना, अपने दुख और अपने क्रोध से डरने लगता है, तो वह भीतर से टूट जाता है और टूटा हुआ इंसान सबसे अच्छा गुलाम बनता है।
नैतिकता ने इस डर को और गहरा किया। अगर किसी से प्रेम हो जाए तो कहा गया यह गलत है, अगर किसी बात पर क्रोध आ जाए तो कहा गया यह असभ्यता है, अगर रोना आए तो कहा गया यह कमजोरी है। इस तरह इंसान को अपने ही भीतर का दुश्मन बना दिया गया। बाहर से वह अच्छा और सभ्य दिखता है लेकिन भीतर भावनाएँ सड़ने लगती हैं। यही कारण है कि सबसे ज़्यादा पाखंड और हिंसा वहीं पैदा होती है जहाँ नैतिकता का सबसे ज़्यादा दिखावा होता है।
ध्यान इस पूरे खेल को उल्टा कर देता है। ध्यान कहता है कि भावनाओं को दबाओ मत, उन्हें देखो। क्रोध आए तो उसे देखो, वासना आए तो उसे देखो, डर आए तो उसे देखो, प्रेम आए तो उसे महसूस करो। जब कोई भावना बिना जजमेंट के देखी जाती है, तो वह अपनी शक्ति खोने लगती है। क्योंकि भावना ऊर्जा है और ऊर्जा को दबाने से नहीं बल्कि जागरूकता से बदला जाता है।
जो इंसान अपनी भावनाओं को देखना सीख लेता है, वह उनके गुलाम नहीं रहता। तब क्रोध उसे नियंत्रित नहीं करता, वासना उसे अंधा नहीं बनाती और डर उसे छोटा नहीं करता। वही इंसान सच में स्वतंत्र होता है। ऐसा इंसान न धर्म से डरता है, न नेता से, न समाज से, क्योंकि उसने अपने भीतर की सच्चाई को देख लिया होता है।
इसलिए पूरी व्यवस्था चाहती है कि इंसान अपनी भावनाओं से डरा रहे। उसे यह विश्वास दिलाया जाए कि जो उसके भीतर उठता है वह गलत है, ताकि वह हमेशा किसी बाहर की सत्ता पर निर्भर रहे। लेकिन सच्चाई यह है कि जो तुम्हारे भीतर उठता है वही जीवन है। उसे समझो, उससे लड़ो मत। क्योंकि जिस दिन इंसान अपनी भावनाओं को समझ लेगा, उसी दिन सारे झूठे नियम, झूठी नैतिकता और झूठे डर अपने आप गिर जाएंगे।


