संसार का कोई भी धर्म आज तक इंसान को परमात्मा से नहीं मिला पाया!— क्यों?

इवोल्यूशन के हिसाब से देखा जाए तो इंसान जब पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था, तब उसका जीवन बहुत ही साधारण था। वह जंगलों में रहता था और अपनी भूख मिटाने के लिए शिकार करता था। उस समय इंसान के पास कोई खास हथियार नहीं थे। न उसके पास तलवार थी, न धनुष-बाण और न ही कोई आधुनिक साधन। वह अपने शरीर पर ही निर्भर था। वह अपने नाखूनों का इस्तेमाल करता था, अपने दांतों का इस्तेमाल करता था और पूरी ताकत लगाकर जानवरों का शिकार करता था। यह आसान काम नहीं था, क्योंकि इंसान शारीरिक रूप से बहुत ताकतवर जानवरों से मुकाबला करता था।

इवोल्यूशन के दौरान आदिम मानव का हथियार के साथ पहला कदम, शिकार और आत्मरक्षा की शुरुआत

अगर हम जंगल के एक उदाहरण को देखें, तो मान लीजिए शेर को अगर हिरण का शिकार करना है। शेर चाहे जितना ताकतवर हो, उसे भी हिरण का शिकार करने के लिए उसके बिल्कुल पास जाना पड़ता है। शेर और हिरण के बीच एक संघर्ष होता है। शेर का मकसद होता है हिरण को पकड़ना और हिरण का मकसद होता है अपनी जान बचाकर भाग जाना। शेर तभी शिकार कर पाता है जब हिरण उसके पंजों में आ जाए, उसके कब्जे में आ जाए। जब तक शेर बिल्कुल पास नहीं पहुंचता, तब तक शिकार संभव नहीं होता।

इंसान की हालत भी पहले बिल्कुल ऐसी ही थी। इंसान को भी शिकार करने के लिए जानवर के बेहद करीब जाना पड़ता था। यही वजह थी कि शिकार करना बहुत मेहनत और जोखिम भरा काम था। लेकिन जैसे-जैसे इंसान की बुद्धि विकसित हुई, उसने अपनी कमजोरी को समझा और समाधान खोजा। उसने यह समझ लिया कि अगर वह जानवर से दूरी बनाए रख सके, तो वह ज्यादा सुरक्षित रहेगा। यहीं से हथियारों का जन्म हुआ।

इंसान ने सबसे पहले पत्थरों का इस्तेमाल किया, फिर भाले बनाए, फिर धीरे-धीरे धनुष-बाण, तलवार, कुल्हाड़ी जैसे हथियार बनाए। हथियार का सबसे बड़ा फायदा यह था कि अब इंसान को शिकार के बिल्कुल पास जाने की जरूरत नहीं थी। वह 10 फुट या 15 फुट की दूरी से ही शिकार कर सकता था। इसने इंसान की मेहनत को बहुत कम कर दिया और उसकी सुरक्षा को बहुत बढ़ा दिया। हथियार इंसान के लिए एक साधन था, जीवन को आसान बनाने का साधन।

समय के साथ इंसान और विकसित हुआ। वह सिर्फ शिकार पर निर्भर नहीं रहा। उसने खेती करना सीख लिया। उसने अनाज उगाना शुरू किया, फल खाने लगा और धीरे-धीरे जंगलों से बाहर आकर गांवों में बसने लगा। गांव बसने लगे और इंसान की जीवनशैली बदल गई। जंगल और इंसान के बीच दूरी बढ़ गई। अब इंसान का रोज़-रोज़ शिकार करना जरूरी नहीं रहा।

लेकिन हथियार फिर भी इंसान ने नहीं छोड़े। कारण यह था कि भले ही शिकार कम हो गया था, लेकिन जंगली जानवरों का खतरा अभी भी बना हुआ था। हथियार अब शिकार के लिए नहीं, बल्कि आत्मरक्षा के लिए इस्तेमाल होने लगे। जो हथियार पहले पेट भरने का साधन थे, वही हथियार अब जान बचाने का साधन बन गए।

फिर समय और बदला। इंसान ने बड़े-बड़े शहर बसा लिए। सभ्यता विकसित हुई। अब इंसान को जानवरों से उतना डर नहीं रहा। जंगल पीछे छूट गए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद हथियार इंसान के जीवन से गायब नहीं हुए। कारण बदल चुका था। अब इंसान को जानवरों से नहीं, बल्कि इंसान से डर लगने लगा था।

अब इंसान ही इंसान पर हमला करने लगा। अब इंसान ही इंसान का दुश्मन बनने लगा। लालच, सत्ता, जमीन, अधिकार और अहंकार के कारण इंसान एक-दूसरे से नफरत करने लगे। हथियारों का इस्तेमाल अब इंसानों के खिलाफ होने लगा। धीरे-धीरे हथियार उन लोगों के हाथ में भी पहुंच गए जो जानबूझकर दूसरों को नुकसान पहुंचाते थे, दूसरों को कष्ट देते थे। आज हम उन्हें अपराधी या मुजरिम कहते हैं।

समय के साथ इंसान समूहों में बंटने लगा। अलग-अलग भाषाओं के लोग अलग-अलग समुदायों में रहने लगे। कई समुदाय मिलकर एक देश बनने लगे। देश बनने लगे और देशों की सीमाएं खिंचने लगीं। इसके साथ-साथ इंसान की ईश्वर को लेकर धारणाएं भी अलग-अलग बनने लगीं। किसी ने ईश्वर को इस रूप में देखा, किसी ने उस रूप में। अलग-अलग नियम, अलग-अलग मान्यताएं और अलग-अलग कर्मकांड बनने लगे।

यहीं से धर्म का निर्माण हुआ। धर्म मूल रूप से जीवन को समझने की एक कोशिश थी, लेकिन धीरे-धीरे धर्म नियमों, कानूनों और कर्मकांडों का एक ढांचा बनता चला गया। हर धर्म में अलग-अलग नियम बनाए गए। ईश्वर को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं दी गईं। इसी वजह से अलग-अलग धर्मों के बीच टकराव शुरू हो गया।

अब जो हथियार इंसान अपनी रक्षा के लिए इस्तेमाल करता था, वही हथियार वह अपने धर्म और अपने समुदाय की रक्षा के लिए इस्तेमाल करने लगा। धीरे-धीरे धर्म के नाम पर कट्टरता बढ़ती चली गई। लोगों ने यह मान लिया कि उनका धर्म ही सबसे सही है और बाकी सब गलत हैं। इसी सोच ने दुनिया में भयानक हिंसा को जन्म दिया।

इतिहास गवाह है कि धर्म के नाम पर लाखों-करोड़ों लोगों की हत्या हुई है।

इतिहास में धर्म के नाम पर हुए संघर्ष और हिंसा को दर्शाता प्रतीकात्मक चित्र

ईसाई इतिहास में क्रूसेड्स इसका बड़ा उदाहरण हैं। 11वीं से 13वीं सदी के बीच पोप और चर्च के आदेश पर युद्ध लड़े गए। यरुशलम को “पवित्र भूमि” बताकर युद्ध किए गए। लाखों मुसलमान, यहूदी और यहां तक कि ईसाई भी मारे गए। नारा था – “God wills it” यानी ईश्वर यही चाहता है।

इसके बाद स्पैनिश इनक्विज़िशन हुई। चर्च ने तय किया कि कौन सही है और कौन विधर्मी है। जो चर्च से सहमत नहीं था, उसे यातनाएं दी गईं, जिंदा जलाया गया, मारा गया। सिर्फ इसलिए कि उसकी सोच अलग थी।

इस्लामी इतिहास में भी कुछ कट्टर शासकों और गुटों ने धर्म की विकृत व्याख्या की। “काफ़िर” या “मुरतद” कहकर लोगों की हत्या की गई। हालांकि यह बात समझना जरूरी है कि सूफ़ी परंपरा इससे बिल्कुल अलग रही है। सूफ़ी संतों ने प्रेम, करुणा और इंसानियत की बात की।

आधुनिक समय में ISIS और अल-क़ायदा जैसे संगठनों ने धर्म का सबसे खतरनाक रूप दिखाया। निर्दोष लोगों की सामूहिक हत्याएं की गईं। सबसे अहम बात यह है कि दुनिया के अधिकांश मुसलमानों ने भी इनका विरोध किया।

हिंदू परंपरा में भी सत्ता और कट्टरता के उदाहरण मिलते हैं। कुछ राजाओं और ब्राह्मणिक सत्ता ने शूद्रों और स्त्रियों पर अत्याचार किए। ज्ञान से वंचित किया गया। जाति के नाम पर सामाजिक हिंसा हुई। रामायण की कथा में शंबूक वध की कहानी को लेकर विवादित व्याख्याएं आज भी चर्चा का विषय हैं।

बौद्ध धर्म, जो मूल रूप से अहिंसा की शिक्षा देता है, वहां भी इतिहास में हिंसा के उदाहरण मिलते हैं। श्रीलंका और म्यांमार में कुछ कट्टर बौद्ध गुटों ने रोहिंग्या मुसलमानों पर हिंसा की। यह बुद्ध की शिक्षा के बिल्कुल विपरीत है।

समय आगे बढ़ा। आज का जमाना पहले जैसा नहीं है। आज हर इंसान के हाथ में हथियार नहीं है। ज्यादातर लोग सामान्य जीवन जीते हैं, काम करते हैं, परिवार में रहते हैं। हथियार अब आम इंसान से दूर हो चुके हैं। आज हथियार मुख्य रूप से सरकारों, सेना और पुलिस के पास हैं।

लेकिन इसके बावजूद धर्म के नाम पर हिंसा खत्म नहीं हुई। कारण बदल चुका है। आज इंसान धर्म को अंधविश्वास, पाखंड और परंपराओं में खोज रहा है। वह इन्हीं चीजों को धर्म मानकर उनकी रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार है। उसे खुद नहीं पता कि धर्म होता क्या है, लेकिन वह धर्म की रक्षा की बात करता है।

आज धर्म एक दुकान बन चुका है। लगभग सभी धर्म ऊंची जातियों और शक्तिशाली वर्गों के हाथ में हैं। नियम-कानून इंसानों ने बनाए हैं, लेकिन उन्हें ईश्वर के नाम पर थोप दिया गया है। लोग खुद कभी धर्म को समझने की कोशिश नहीं करते। उन्हें लगता है कि जो रीति-रिवाज चले आ रहे हैं, वही धर्म हैं।

जबकि महापुरुषों ने धर्म के बारे में कुछ और ही कहा है।

इतिहास में धर्म के नाम पर हुए संघर्ष और हिंसा को दर्शाता प्रतीकात्मक चित्र

गौतम बुद्ध ने कहा कि धर्म दुःख से मुक्ति का मार्ग है। आत्मनिरीक्षण और करुणा ही धर्म है। महावीर स्वामी ने अहिंसा, सत्य और संयम को धर्म बताया। गुरु नानक देव जी ने पाखंड का विरोध किया और कहा कि इंसान पहले इंसान है। कबीर ने बाहरी पूजा से ऊपर आत्मज्ञान को रखा।

अष्टावक्र ने कहा कि तुम पहले से ही मुक्त हो। लाओत्से ने प्राकृतिक और सहज जीवन को धर्म कहा। कन्फ्यूशियस ने नैतिक आचरण को धर्म बताया। ईसा मसीह ने प्रेम और क्षमा की शिक्षा दी। रूमी ने प्रेम में ईश्वर को देखा। सूफ़ी दृष्टि में हज़रत मोहम्मद ने न्याय और दया को महत्व दिया। रामकृष्ण परमहंस ने कहा कि सभी मार्ग एक ही सत्य तक जाते हैं। स्वामी विवेकानंद ने मानव सेवा को ईश्वर सेवा कहा।

इन सभी महापुरुषों की शिक्षा एक ही बात कहती है कि धर्म का कर्मकांड से कोई लेना-देना नहीं है। धर्म मंदिर, मस्जिद, मजार या मूर्ति में नहीं है। धर्म प्रेम, करुणा और आत्मबोध है।

लेकिन इंसान इस सच्चाई को भूल चुका है। उसे लगता है कि धर्म की रक्षा करके उसे मोक्ष मिल जाएगा। यह सबसे बड़ा भ्रम है। इतिहास में आज तक किसी ने धर्म के नाम पर हत्या करके न ईश्वर पाया है, न मोक्ष और न ही ज्ञान।

आज धर्म राजनीति और सत्ता का औजार बन चुका है। तुम्हारी भावनाओं को भड़काकर तुम्हें नचाया जा रहा है और तुम खुशी-खुशी नाच रहे हो। इस चक्कर में तुम अपनी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक समस्याओं को नजरअंदाज कर रहे हो।

अंत में यही कहा जा सकता है कि जिस धर्म के लिए हत्या करनी पड़े, वह धर्म हो ही नहीं सकता। ईश्वर ने कोई धर्म नहीं बनाया। धर्म इंसानों की बनाई हुई व्यवस्था है और इंसान गलतियों से भरा हुआ है। इसलिए हर धर्म की आलोचना और आत्मपरीक्षण जरूरी है।

धर्म को समझो, उसे दुकान मत बनाओ। प्रेम को अपनाओ, हिंसा को नहीं। यही सच्चा धर्म है।

निष्कर्ष

जिस धर्म की रक्षा के लिए इंसान को हथियार उठाने पड़ें, वह धर्म नहीं हो सकता। सच्चा धर्म आत्मबोध है, प्रेम है और करुणा है। जब तक इंसान धर्म को समझेगा नहीं, तब तक वह भ्रम में ही जीता रहेगा।

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Vinod Changotra
Vinod Changotra

मैं विनोद चंगोत्रा, ध्यान और आत्म-ज्ञान के मार्ग पर कई वर्षों से साधना कर रहा हूँ।
मेरा उद्देश्य जीवन के गहरे सत्य, मन की शांति, और आत्म-चेतना के अनुभवों को सरल और सहज भाषा में सभी तक पहुँचाना है।

मैंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान यह जाना कि मन को समझना ही जीवन को समझने का पहला कदम है। ध्यान केवल तकनीक नहीं—एक अनुभव है। शांति बाहर नहीं, भीतर से उत्पन्न होती है। समाज को समझना स्वयं को समझने का मार्ग खोलता है। इन वास्तविक अनुभवों और सीख को साझा करने के लिए ही मैंने यह ब्लॉग बनाया है।

मेरे लेख उन लोगों के लिए हैं जो मन को शांत करना चाहते हैं। ध्यान सीखना चाहते हैं।आध्यात्मिकता को व्यवहार में लाना चाहते हैं। जीवन को गहराई से समझना चाहते हैं। अपनी सोच और दृष्टि को बदलना चाहते हैं।

मेरी कोशिश है कि मैं हर पाठक तक ऐसा ज्ञान पहुँचाऊँ जो सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि जीवन में उतारने के लिए हो। ध्यान, आध्यात्म और जीवन-दर्शन पर मेरी यात्रा अभी भी चल रही है और मैं जो भी सीखता हूँ, वही इस ब्लॉग पर आप सभी के साथ साझा करता हूँ।

— विनोद चंगोत्रा

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