पूरी दुनिया में पुनर्जन्म के बहुत सारे केस सामने आए हैं और भारत में तो ऐसे मामलों की संख्या काफी अधिक देखने को मिलती है। कई छोटे बच्चे अपने पिछले जन्म की बातें बताते हैं—वे बताते हैं कि वे पहले कौन थे, कहाँ रहते थे, कैसे मरे आदि। इनमें से कुछ प्रसिद्ध केस भी हैं जैसे शांति देवी और टीटू सिंह। इन मामलों पर कुछ प्रोफेशनल वैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों ने रिसर्च भी की और कई मामलों में उन्हें धोखाधड़ी या झूठ बोलने के स्पष्ट सबूत नहीं मिले। हालांकि यह भी सच है कि पुनर्जन्म के बहुत सारे ऐसे केस होते हैं जिनमें झूठ, भ्रम या नाटक शामिल होता है, और कुछ मामलों में लोगों ने जानबूझकर धोखाधड़ी भी की है।

फिर भी सवाल वही रहता है—जब कुछ केस ऐसे हैं जिनमें धोखाधड़ी साबित नहीं हुई, तो विज्ञान और मनोविज्ञान पुनर्जन्म को क्यों नहीं मानते? इसका उत्तर विज्ञान की कार्य-प्रणाली में छिपा है। विज्ञान किसी भी बात को मानने के लिए ठोस, दोहराए जा सकने वाले और मापे जा सकने वाले प्रमाण चाहता है। पुनर्जन्म के केस अक्सर अलग-अलग, अनियंत्रित और एक-एक करके सामने आते हैं, जिन्हें प्रयोगशाला की तरह दोहराया नहीं जा सकता। साथ ही आत्मा, चेतना या स्मृति के स्थानांतरण को अभी तक किसी वैज्ञानिक उपकरण से मापा नहीं जा सका है, और न ही यह स्पष्ट हो पाया है कि यदि पुनर्जन्म होता है तो उसका तंत्र (mechanism) क्या है—आत्मा शरीर कैसे छोड़ती है, नया शरीर कैसे पाती है और यादें कैसे स्थानांतरित होती हैं।
विज्ञान यह नहीं कहता कि “हम नहीं मानेंगे” बल्कि वह यह कहता है कि “इसके पीछे भी कोई वैज्ञानिक कारण अवश्य होगा जिसे अभी हम खोज नहीं पाए हैं।” दर्शन भी यही कहता है कि प्रकृति में कुछ ऐसे रहस्य हैं जिन्हें विज्ञान अभी तक पूरी तरह समझ नहीं पाया है। इसलिए विज्ञान का इनकार अहंकार नहीं बल्कि उसकी सीमाओं और उसकी विधि का परिणाम है।
अब सवाल उठता है कि विज्ञान इन छिपे हुए कारणों तक अभी तक क्यों नहीं पहुँच पाया, जबकि उसने हवाई जहाज, स्मार्टफोन, कारें, परमाणु ऊर्जा और सूक्ष्म अणुओं तक की खोज कर ली है? इसका एक बड़ा कारण यह है कि पुनर्जन्म का विषय समाज के लिए कोई तात्कालिक और गंभीर समस्या नहीं है। उदाहरण के लिए जब कोरोना महामारी आई थी तो वह पूरी दुनिया के लिए खतरनाक और जानलेवा थी। तब सरकारों ने वैज्ञानिकों को तुरंत उसकी दवा और वैक्सीन बनाने के लिए लगाया और कुछ ही महीनों में परिणाम सामने आ गया। क्योंकि वह समस्या तत्काल और घातक थी, इसलिए उस पर वैश्विक स्तर पर संसाधन, समय और धन लगाया गया।
इसके विपरीत पुनर्जन्म के मामले समाज के लिए न तो खतरनाक हैं और न ही ऐसी समस्या हैं जिनसे लोगों का जीवन सीधे प्रभावित होता हो। 800 करोड़ की दुनिया में अगर कुछ सौ या हजार केस सामने आते हैं तो सरकारें, संस्थान और वैज्ञानिक उसे प्राथमिकता नहीं देते। इसीलिए इस क्षेत्र में न तो बड़े पैमाने पर फंडिंग होती है, न व्यापक रिसर्च प्रोग्राम बनते हैं और न ही बहुत अधिक वैज्ञानिक इसमें गहरी रुचि लेते हैं। कुछ गिने-चुने शोधकर्ता जरूर इस विषय पर काम करते हैं, लेकिन पर्याप्त संसाधन और समर्थन न मिलने के कारण वे भी बहुत गहराई तक नहीं पहुँच पाते।
साथ ही यह विषय शिक्षा प्रणाली का भी अनिवार्य हिस्सा नहीं है। स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालयों में इसे पढ़ाना जरूरी नहीं माना जाता, इसलिए इस क्षेत्र में नए शोधकर्ताओं की संख्या भी बहुत कम है। परिणामस्वरूप यह विषय सीमित दायरे में ही रह जाता है और मुख्यधारा के विज्ञान तक नहीं पहुँच पाता।
फिर भी एक संतुलित दृष्टिकोण यह कहता है कि पुनर्जन्म के सभी मामलों को अंधविश्वास कहकर खारिज कर देना भी सही नहीं है, क्योंकि कुछ केस ऐसे हैं जिनमें अभी तक स्पष्ट धोखाधड़ी सिद्ध नहीं हुई। वहीं दूसरी ओर, केवल कुछ घटनाओं के आधार पर इसे पूरी तरह सिद्ध सत्य मान लेना भी वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिए सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि पुनर्जन्म अभी विज्ञान के लिए एक “अनसुलझा रहस्य” है—न पूरी तरह सिद्ध, न पूरी तरह खारिज।
भविष्य में हो सकता है कि विज्ञान इस विषय की गहराइयों तक पहुँचे और उन छिपे हुए कारणों को खोज ले जिनकी हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन फिलहाल हमें यही समझना चाहिए कि यह विषय आस्था, दर्शन और विज्ञान—तीनों के बीच खड़ा है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह संभव माना जा सकता है, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से यह अभी प्रमाणित नहीं है।